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मैं डरता हूँ

मैं डरता हूँ 


मैं डरता हूँ इस दिन रात बदलती दुनिया से,
मैं डर जाता हूँ इस सीमेंट के बढ़ते जंगल से,
नोंचती है मुझको बढ़ती भीड़ में भी तन्हाई,
जहाँ आधुनिकता के नाम पर बड़ियां चलती संग बन परछाईं। 

मैं डरता हूँ इस विकास के दानव से, 
मैं डर जाता हूँ इस धरती माँ को खंगालते मानव से,
रूह कांपती है मेरी देख उजड़ते खेतों को,
जहाँ लहलहाती थी फसलें देख वहाँ बनते पैसे के महलों को। 

मैं डरता हूँ इस बिलखती गंगा, जमुना, सरस्वती के मौत मांगने से,
मैं डर जाता हूँ इनके निर्मल आँचल के कहीं खो जाने से,
आँखों से बहती है खून की नदियां इनकी बेबस छटपटाहट पर,
जहाँ धूं-धूँकर जल रही इनकी ही अस्थियां अपने ही घाटों पर। 

मैं डरता हूँ इस चूहे से दुबकते बाघ,शेर, चीते से,
मैं डर जाता हूँ एसी कमरों में बैठे बढ़ई के फीते से,
अपने ही घर में बेघर तलाशता हूँ जंगल के आँगन को,
जो भेंट चढ़ गया लालची बढ़ई की नीची दबी खानन को। 

रजत त्रिपाठी की कच्ची कलम की श्याही से... 

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