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मैं डरता हूँ

मैं डरता हूँ  मैं डरता हूँ इस दिन रात बदलती दुनिया से, मैं डर जाता हूँ इस सीमेंट के बढ़ते जंगल से, नोंचती है मुझको बढ़ती भीड़ में भी तन्हाई, जहाँ आधुनिकता के नाम पर बड़ियां चलती संग बन परछाईं।  मैं डरता हूँ इस विकास के दानव से,  मैं डर जाता हूँ इस धरती माँ को खंगालते मानव से, रूह कांपती है मेरी देख उजड़ते खेतों को, जहाँ लहलहाती थी फसलें देख वहाँ बनते पैसे के महलों को।  मैं डरता हूँ इस बिलखती गंगा, जमुना, सरस्वती के मौत मांगने से, मैं डर जाता हूँ इनके निर्मल आँचल के कहीं खो जाने से, आँखों से बहती है खून की नदियां इनकी बेबस छटपटाहट पर, जहाँ धूं-धूँकर जल रही इनकी ही अस्थियां अपने ही घाटों पर।  मैं डरता हूँ इस चूहे से दुबकते बाघ,शेर, चीते से, मैं डर जाता हूँ एसी कमरों में बैठे बढ़ई के फीते से, अपने ही घर में बेघर तलाशता हूँ जंगल के आँगन को, जो भेंट चढ़ गया लालची बढ़ई की नीची दबी खानन को।  रजत त्रिपाठी की कच्ची कलम की श्याही से... 

दहकती भारतीय रेलवे

दहकती भारतीय रेलवे गर्मियों  का मौसम आते ही भारतीय रेलवे पर भीड़ का पहाड़ टूट पड़ता है। इस मौसम के आते ही लगता है मानो जैसे किसी ने बांध् से पानी छोड़ दिया हो और वह अपनी पूरी रफ्रतार से आगे बढ़ रहा हो। देश की राजधनी दिल्ली में चार प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं । जहां पर हमेशा भीड़ का तांता लगा रहता है। आनंद विहार, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली व हजरत निजामुद्दीन सदैव भीड़ से ठसा-ठस भरा रहता है। ऐसा नहीं है कि यह एक मौसम या इसी वर्ष की समस्या है। यह समस्या है हर वर्ष, हर मौसम और हर रोज की। इसी कारण रोजाना यात्रियों के लहु-लुहान व मौत तक की खबर आती रहती है। ट्रेनों के प्लेटपफार्म पर आते ही उसके भीतर प्रवेश करने के लिए यात्रियों में जंग छिड़ जाती है। यह जंग स्टेशन में घुसने से लेकर ट्रेन के अंदर घुसने तक जारी रहती है। आज कल यह जंग इतना विकराल रूप ले लेती है कि यात्रियों को लहुलुहान तक हो जाना पड़ता है। इस जंग के खत्म हो जाते ही आगाज होता है टेªन के भीतर की जंग का। सफर करने के लिए दो गज जगह तलाशने का, जहां वो खड़े हो सफर तय कर सके। कई सौ की संख्या में लोगों को भारी भरकम रकम अदा करने पर भी मिलों का स...

आखिर अब आगे क्या …

जोरों-शोरों से चुनावी बिगुल बजा, महारथी मैदान में उतर आए, भीषण गरजना के साथ रणभूमि सजी और अब यह अपने समापन की और परंतु क्या वकई यह युद्ध समाप्त हुआ। क्या इसके उपरांत कोई नया बिगुल नहीं बजेगा, क्या कोई नया रण आरंभ नहीं होगा, क्या राष्ट्र की राजनीतिक सरजमीं ठंडी हो जाएगी। ऐसे ही तमाम सवाल देश के दिल में उफ्फान मार रहे हैं। आखिर अब नई सरकार बनने के बाद आगे क्या। जिस चुनावी लहर से देश ग्रस्त था, उसके समापन का रंग कैसा होगा। यह देखने के लिए पूरा विश्व उत्सुक है और उनका उत्सुक होना भी लाज्मी है। जो जन समर्थन इस चुनावी समर में दिखा, वह पहले कभी भी देखने को नहीं मिला। मतदान केंद्रों पर उमड़ी मतदाताओं की भीड़ यह साफ बायां कर रही थी कि जनादेश में जागरूता, कामनाएं, उम्मीद, और आशाएं अजागर हो उठीं हैं। वो एक बेहतर कल, एक बेहतर भविष्य और तमाम झंझटों से मुक्त एक समाज चाहता है। पर क्या चुनावी नतीजों का सूरज मतदाताओं की उम्मीद को ज्योतिर्मय पायेगा? मतदाताओं ने जिस जोश, उत्साह, जनसमर्थन से एकजुट होकर राष्ट्र हित के लिए मतदान किया, क्या वो नतीजों के बाद अदृशय हो जायेगा? सड़कों पर उतरी...