इन बूढ़ी आँखों ने देखा है.…
कामयाब चेहरों को खून में नहाये देखा है मैंने,
फेकने वालों को उनके ही घरों में पीटते भी देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
पसीने से मंज़िलों के पते बदलते देखा है मैंने...
आशिक़ी में पहलवान शेरोन को रोते देखा है मैंने,
मोहब्बत में दहाड़ती कलियों को भी देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
आशिक़ी में बेस बसाये घरों को उजड़ते देखा है मैंने...
कई सावन के झूलों में झूलती हंसी को देखा है मैंने,
कई मासूमों को निर्मम पीटते भी देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
कालिख से नहाये हीरे को भी चमकते देखा है मैंने...
भोर रवि की धीमी किरणों में कलियों को मुरझाते देखा है मैंने,
चाँद की रोशिनी से भी दहकते जवालामुखी को देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
तारों को भी आसमान से जमीं पर उतरते देखा है मैंने...
गले लगने वालों को पीठ में खंज़र घोंपते देखा है मैंने
बाहर से आये, मरहम लगाते पैगम्बर को भी देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
दिल में बसे लोगों को ही दिल तोड़ते देखा है मैंने...
चमचमाते चेहरों के तपते- मायूस रंग देखे हैं मैंने,
कामयाबी की चादर में लिपटे पैरों के छाले भी देखे है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
दिन रात तपते पत्थर में से सोने को निकलते देखा है मैंने...
बंज़र जमीं पर लहलहाती फसलों को देखा है मैंने,
शहरों को शमशान बनते भी देखा है मैंने,
इस बूढी आँखों की झुर्रियों पर मत जाओ जालिम,
आलिशान इमारतों में मुर्दों को बसते भी देखा है मैंने...
waah rajat sahab....
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